नई दिल्ली, 31 अगस्त (Udaipur Kiran) । राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने रविवार को नई दिल्ली में अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के भगवान बिरसा मुंडा भवन (जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र) के लोकार्पण समारोह में कहा कि हम एक रक्त के हैं, भारत माता की संतान हैं, इसी भूमि की पुत्र-पुत्रियां हैं। हमारे भीतर कोई भेद नहीं है। समाज की धाराएं अलग-अलग दिख सकती हैं लेकिन सब मिलकर ही देश की मुख्यधारा बनती हैं, और इस सत्य को जन-जन तक पहुंचाना ही हमारा कर्तव्य है। इसी दिशा में वनवासी कल्याण आश्रम काम कर रहा है।
इस लोकार्पण कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल, किरेन रिजिजू, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री दुर्गादास उइके तथा महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी जी महाराज उपस्थित रहे।
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि यह भवन केवल एक निर्माण नहीं, बल्कि एक विचार और संकल्प है, जिसका उद्देश्य है जनजातीय समाज के जीवन, परंपरा, अस्मिता और योगदान को समर्पित अनुसंधान और प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करना। भारतीय समाज केवल नगरवासी या ग्रामवासी नहीं है, बल्कि वनवासी समाज भी इसकी उतनी ही महत्वपूर्ण धारा है, जिसने भारत की संस्कृति, इतिहास और आत्मा को समृद्ध किया है।
सरकार्यवाह ने कहा कि वनवासी कल्याण आश्रम ने केवल जनजातीय समाज के मुद्दों को सरकार के सामने रखने का काम नहीं किया, बल्कि देश के सामान्य नागरिकों को भी उनकी जिम्मेदारी से जोड़ा। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है क्योंकि यदि विकास के नाम पर जंगल उजाड़े जाते हैं, जनजातीय अस्मिता कुचली जाती है और उनका पुनर्वास सुनिश्चित नहीं होता, तो यह सामाजिक अन्याय है। जनजातीय समाज विकास का विरोधी नहीं है, परंतु जब उसे बिना पुनर्वास के उसकी भूमि से विस्थापित किया जाता है, तभी समस्या उत्पन्न होती है।
दत्तात्रेय होसबाले ने भारतीय ज्ञान परंपरा में जनजातीय योगदान की चर्चा करते हुए झारखंड के जनजातीय समाज द्वारा परंपरागत पद्धति से उच्च गुणवत्ता का स्टील तैयार करने की ऐतिहासिक तकनीक को उदाहरण के तौर पर बताया। उन्होंने ऐसे योगदानों पर गहन शोध की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि आज जनजातीय समाज एक सांस्कृतिक आक्रमण का सामना कर रहा है, जहां धर्मांतरण की प्रक्रियाएं उनके जीवन को प्रभावित कर रही हैं। जनजातीय समाज को बहलाकर, लालच देकर या धोखे से मतांतरण कराया जा रहा है। यह केवल एक धार्मिक संकट नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अखंडता का संकट है।
उन्होंने सभी भारतीयों से अपील की कि वे अपने जीवन में यह आत्मपरीक्षण करें कि उन्होंने जनजातीय समाज के लिए क्या किया। किसी छात्र की पढ़ाई, किसी उत्पाद के विपणन, किसी बीमार के इलाज या रोजगार की व्यवस्था में उनका सहयोग करें। समाज परिवर्तन केवल रिपोर्टों और फोटो से नहीं आता, उसे जीवन में उतारना होता है। तभी देश का अंतिम नागरिक आत्मविश्वास से ‘भारत माता की जय’ बोल पाएगा।
कार्यक्रम में केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने कहा कि भारत में जब तक सांस्कृतिक स्वतंत्रता नहीं थी, तब तक शासन स्थायी नहीं हो सकता था। अंग्रेजों और मिशनरियों ने धर्मांतरण के माध्यम से जनजातीय समाज को भ्रमित करने का प्रयास किया, लेकिन भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों ने युवावस्था में ही इसका विरोध करना शुरू कर दिया।
मनोहर लाल ने कहा कि बिरसा मुंडा ने मिशनरी स्कूलों में पढ़ाई के दौरान ही पहचान लिया था कि जनजातीय समाज को कैसे बहलाया जा रहा है। उन्होंने उसका विरोध किया और अंततः स्कूल से निकाले गए। उन्होंने युवा होते ही सामाजिक जागरण का कार्य शुरू किया और केवल 25 वर्ष की आयु में जेल में उनका बलिदान हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि अंग्रेजों ने 1871 में ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लागू किया, जिसमें जनजातीय समाज को जन्म से अपराधी माना गया। भाजपा सरकार ने इस अन्याय के खिलाफ कदम उठाया है और हरियाणा जैसे राज्यों में ऐसे कानूनों को समाप्त किया गया है।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के लोग और जनजातीय समाज को अक्सर मुख्यधारा से अलग बताया जाता है, लेकिन वास्तव में वे ही मुख्यधारा हैं। देश में अगर किसी संगठन ने जनजातीय समाज को दिल से अपनाया है, तो वह संघ परिवार और वनवासी कल्याण आश्रम है। भारत के विकास में सभी समुदायों की भागीदारी जरूरी है, लेकिन जनजातीय समाज को अलग बताना या उनके साथ ‘धारा में जोड़ने’ जैसा व्यवहार करना उचित नहीं है, क्योंकि वे स्वयं मुख्यधारा हैं।
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री दुर्गादास उइके ने भगवान बिरसा मुंडा भवन के लोकार्पण को ऐतिहासिक बताया और कहा कि यह भवन अनुसंधान और प्रशिक्षण का केंद्र बनेगा, जिससे जनजातीय समाज के विभिन्न पहलुओं पर शोध हो सकेगा। अनेक महापुरुषों के योगदान को भुला दिया गया है, और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक परंपराएं विस्मृति की ओर जा रही हैं। इस भवन के माध्यम से उन परंपराओं का पुनः स्मरण और संरक्षण किया जा सकेगा।
महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी ने मिशनरियों द्वारा जनजातीय समाज की संस्कृति, वेशभूषा और जीवनशैली को नष्ट करने के प्रयासों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ईसाई मिशनरियों ने भारत ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के आदिवासी समाज को भी समाप्त किया। भारत में भी इसी तरह की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें जनजातीय अस्मिता को मिटाया जा रहा है। उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्था जनजातीय संस्कृति को बचाने का कार्य कर रही है।
कार्यक्रम में वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा कि अंग्रेजों और वामपंथियों ने भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है, जिससे समाज भ्रमित हुआ है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की छवि को भी गलत तरीके से पेश किया गया है और यही कारण है कि आज समाज को उनका सही चित्रण दिखाने की आवश्यकता है। उन्होंने अनुसंधान केंद्र को इस दिशा में एक सशक्त कदम बताया।
उल्लेखनीय है कि यह भवन मेट्रो एन्क्लेव रोड, सेक्टर-6, पुष्प विहार, नई दिल्ली में निर्मित किया गया है। इसे महान जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की स्मृति में समर्पित किया गया है, जो भारत के जनजातीय समुदायों के बलिदान, संघर्ष और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक हैं। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष 15 नवंबर 2024 से 15 नवंबर 2025 को जनजातीय गौरव वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।
यह भवन जनजातीय सशक्तीकरण का एक प्रभावशाली केंद्र बनेगा, जहां जनजातीय जीवन से जुड़े विषयों पर अनुसंधान, युवाओं के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण तथा पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और प्रसार से संबंधित विविध गतिविधियाँ संचालित की जाएंगी। यह केंद्र न केवल जनजातीय समाज के सर्वांगीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, बल्कि भगवान बिरसा मुंडा की प्रेरणादायी विरासत को जीवंत रखने का भी सशक्त प्रयास है।
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(Udaipur Kiran) / प्रशांत शेखर
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