रामबाबू मित्तल, मेरठ: पुलिस लाइन में उस समय हड़कंप मच गया, जब रविवार को अचानक पी-ब्लॉक में बने एक जर्जर मकान की छत भरभराकर गिर गई। इस हादसे में पुलिस विभाग में बतौर टेलर काम करने वाले ओंकार गंभीर रूप से घायल हो गए, जबकि चार को मामूली चोटें आई हैं। सूचना पर पहुंचे अधिकारियों ने सभी को आनन-फानन में उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां चार को दवा देकर घर भेज दिया, जबकि ओंकार का इलाज चल रहा है।
छत गिरने की सूचना मिलते ही एडीजी ज़ोन भानु भास्कर, डीआईजी और एसएसपी डॉ. विपिन ताडा समेत भारी पुलिस बल मौके पर पहुंच गया। अधिकारियों ने न सिर्फ क्षतिग्रस्त मकान का मुआयना किया, बल्कि आसपास खड़े अन्य जर्जर मकानों की हालत भी देखी। एडीजी भानु भास्कर ने कहा कि हादसे में एक व्यक्ति घायल हुआ है, बाकी परिवार के चार सदस्यों को मामूली चोट हैं, लेकिन सब सुरक्षित हैं। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि पीड़ित परिवार को रहने के लिए नया क्वार्टर दिया जाएगा।
पुलिस लाइन की स्थिति: खतरे के साये में रह रहे परिवार
इस हादसे के बाद पुलिस लाइन में रहने वाले अन्य परिवारों की चिंताएं बढ़ गईं। वर्षों से जर्जर मकानों में रह रहे पुलिसकर्मियों के परिवार अब अपनी सुरक्षा को लेकर सवाल उठा रहे हैं। महिलाओं ने अधिकारियों के सामने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। एक महिला ने कहा कि हम रोज मौत के साये में जीते हैं। दीवारों में दरारें हैं, छत से प्लास्टर झड़ता है। छोटे-छोटे बच्चे डर में रहते हैं कि कब दीवार गिर जाए। महिलाओं का कहना है कि करीब 15 साल पहले अंतिम बार मरम्मत हुई थी। इसके बाद से अब तक कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की।
मरम्मत का दावा और परिवारों का विरोध
एसएसपी डॉ. विपिन ताडा का कहना है कि समय-समय पर मकानों की मरम्मत कराई जाती रही है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मरम्मत सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रही, वास्तविक सुधार नहीं हुआ। कई घरों में छतें रिसती हैं, खिड़कियों और दरवाजों के हाल बेहाल हैं। बरसात के दिनों में हालात और ज्यादा बिगड़ जाते हैं।
हादसा टल सकता था?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर समय रहते मरम्मत कराई जाती तो यह हादसा टल सकता था। परिवारों का कहना है कि वर्षों से खतरे की चेतावनी दी जा रही थी, लेकिन अधिकारियों ने अनदेखी की। इस घटना के बाद परिवारों ने मांग की है कि सभी जर्जर मकानों का तुरंत सर्वे कराया जाए और सुरक्षित मकानों का इंतजाम किया जाए।
सुरक्षा बनाम उपेक्षा
पुलिस लाइन, जहां प्रदेश भर से आए पुलिसकर्मी और उनके परिवार रहते हैं, वहां इस तरह की स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है। यह वही जगह है, जहां सुरक्षा बलों को न सिर्फ आराम, बल्कि सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, लेकिन यहां के हालात बिल्कुल उलटे हैं। दरारों वाली दीवारें, टूटती छतें और रिसाव से जूझते कमरे परिवारों को लगातार खतरे में डाल रहे हैं।
महिला आवाजों का खुलकर उठना
हादसे के बाद महिलाओं ने खुलकर अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि बच्चों और बुजुर्गों को लेकर सबसे ज्यादा डर बना रहता है। बारिश के दिनों में छतों से टपकता पानी, दीवारों से गिरता प्लास्टर और मकान के टूटने का डर हर पल बना रहता है।
छत गिरने की सूचना मिलते ही एडीजी ज़ोन भानु भास्कर, डीआईजी और एसएसपी डॉ. विपिन ताडा समेत भारी पुलिस बल मौके पर पहुंच गया। अधिकारियों ने न सिर्फ क्षतिग्रस्त मकान का मुआयना किया, बल्कि आसपास खड़े अन्य जर्जर मकानों की हालत भी देखी। एडीजी भानु भास्कर ने कहा कि हादसे में एक व्यक्ति घायल हुआ है, बाकी परिवार के चार सदस्यों को मामूली चोट हैं, लेकिन सब सुरक्षित हैं। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि पीड़ित परिवार को रहने के लिए नया क्वार्टर दिया जाएगा।
पुलिस लाइन की स्थिति: खतरे के साये में रह रहे परिवार
इस हादसे के बाद पुलिस लाइन में रहने वाले अन्य परिवारों की चिंताएं बढ़ गईं। वर्षों से जर्जर मकानों में रह रहे पुलिसकर्मियों के परिवार अब अपनी सुरक्षा को लेकर सवाल उठा रहे हैं। महिलाओं ने अधिकारियों के सामने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। एक महिला ने कहा कि हम रोज मौत के साये में जीते हैं। दीवारों में दरारें हैं, छत से प्लास्टर झड़ता है। छोटे-छोटे बच्चे डर में रहते हैं कि कब दीवार गिर जाए। महिलाओं का कहना है कि करीब 15 साल पहले अंतिम बार मरम्मत हुई थी। इसके बाद से अब तक कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन किसी ने सुनवाई नहीं की।
मरम्मत का दावा और परिवारों का विरोध
एसएसपी डॉ. विपिन ताडा का कहना है कि समय-समय पर मकानों की मरम्मत कराई जाती रही है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मरम्मत सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रही, वास्तविक सुधार नहीं हुआ। कई घरों में छतें रिसती हैं, खिड़कियों और दरवाजों के हाल बेहाल हैं। बरसात के दिनों में हालात और ज्यादा बिगड़ जाते हैं।
हादसा टल सकता था?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर समय रहते मरम्मत कराई जाती तो यह हादसा टल सकता था। परिवारों का कहना है कि वर्षों से खतरे की चेतावनी दी जा रही थी, लेकिन अधिकारियों ने अनदेखी की। इस घटना के बाद परिवारों ने मांग की है कि सभी जर्जर मकानों का तुरंत सर्वे कराया जाए और सुरक्षित मकानों का इंतजाम किया जाए।
सुरक्षा बनाम उपेक्षा
पुलिस लाइन, जहां प्रदेश भर से आए पुलिसकर्मी और उनके परिवार रहते हैं, वहां इस तरह की स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है। यह वही जगह है, जहां सुरक्षा बलों को न सिर्फ आराम, बल्कि सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए, लेकिन यहां के हालात बिल्कुल उलटे हैं। दरारों वाली दीवारें, टूटती छतें और रिसाव से जूझते कमरे परिवारों को लगातार खतरे में डाल रहे हैं।
महिला आवाजों का खुलकर उठना
हादसे के बाद महिलाओं ने खुलकर अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि बच्चों और बुजुर्गों को लेकर सबसे ज्यादा डर बना रहता है। बारिश के दिनों में छतों से टपकता पानी, दीवारों से गिरता प्लास्टर और मकान के टूटने का डर हर पल बना रहता है।
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